“मथुरा से दिल्ली तक न्याय की तलाश”

लेखक-विष्णु टांडी

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एक स्त्री के प्रति किसी पुरुष का जबरन शारीरिक अत्याचार या उससे भी ज्यादा अमानवीय वयवहार, न तो ये शब्द नया है ना यह कृत्य, हर बार नया अगर कुछ होता है, तो वो है लाचार पीड़िता और पशुता लांघने वाला पुरुष । भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रतिदिन 93 बलात्कार के मामले दर्ज होते है

बलात्कार जिसे अंग्रेजी में ‘रेप’ कहते है, महिलाओं के खिलाफ होने वाला सर्वाधिक हिंसक कृत्य है, जो न केवल उनकी शारीरिक अखंडता को नष्ट करता ह बल्कि वय्क्तिगत व् सामाजिक संबंधो के उनकी विकास की क्षमता को बाधित कर उनके जीवन और जीविका को प्रभावित करता है। बलात्कार भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अंतर्गत दंडनीय अपराध है । एक स्त्री के प्रति किसी पुरुष का जबरन शारीरिक अत्याचार या उससे भी ज्यादा अमानवीय वयवहार, न तो ये शब्द नया है ना यह कृत्य, हर बार नया अगर कुछ होता है, तो वो है लाचार पीड़िता और पशुता लांघने वाला पुरुष ।

यत्र नार्यस्तु पुज्य्न्ते रमन्ते तत्र देवता के पवित्र आदर्शो व् नैतिक मूल्यों की संस्कृति की नीव पर विकसित देश में एक और जहां दिन प्रतिदिन नारी हिंशा का ग्राफ बढ़ रहा है वहीं दूसरी और हमारे नेता लोग जो की जनकल्याण और समाज को अपराध मुक्त बनाने का वादा कर सत्ता में आते हैं, अपने विवादित बयानों से बाज नही आ रहे है। हल ही में समाजवादी पार्टी के नेता तोताराम यादव जी ने  मैनपुरी में जिला जेल का निरिक्षण करते समय  अपनी एक्सपर्ट ओपिनियन देते हुई कहा की क्या है बलात्कार? ऐसी कोई चीज़ नही है। लड़के और लड़कियों की आपसी सहमति से होते हैबलात्कार, और ऐसे मामलो में सरकार की कोई जवाबदेही नही बनती।

भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रतिदिन 93 बलात्कार के मामले दर्ज होते है, प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 2013 में सबसे अधिक मध्य प्रदेश में 4335  मामले दर्ज हुए है जबकि पुरे देश में कुल 33707  बलात्कार के मामले दर्ज हुए है।  रिपोर्ट के अनुसार ये तो सिर्फ वो आंकड़े है जो थानो में दर्ज हुए है जबकि बहुत सारे केस तो ऐसे होते है जो थानो में पहुंचे ही नही। वहीं दूसरी और विश्व स्वास्थ्य संगठन  के एक अध्यन के अनुसार भारत में प्रत्येक54 वे मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।

एक न्यायिक विभाग के सदस्य के नाते, कानून का एक विद्यार्थी होने के नाते, निरंतर बदलती न्यायिक वव्यस्थाओं के प्रत्यक्ष साक्षी होने और इस तथाकथित सभ्य समाज का सदस्य होने के नाते मेरा यह दायित्व बन जाता है, की में इस अमानवीय कृत्य की शिकार उन पीड़िताओं की कहानी आपके साथ साझा करूँ जिन्हे आज भी न्याय की तलाश है।

 मथुरा रेप केस -1972-

1972 में महाराष्ट्र के एक गांव की लड़की मथुरा (परिवर्तित नाम ),जब रिपोर्ट लिखवाने पुलिस थाने गयी तब वंहा  2  कॉन्स्टेबल ने उसके साथ बलात्कार किया। इस मामले में पहले तो पुलिस ने केस ही दर्ज नही किया लेकिन स्थानीय लोगों के हंगामे के बाद केस तो दर्ज हुआ परन्तु  1974 में निचली अदालत ने इस आधार पर बरी कर दिया की मथुरा को सेक्स की आदत थी और उसके शरीर पर कोई चोट के निशान भी नही थे इसलिए यह सेक्स उसकी सहमति के साथ किया गया था। जब मामला मुंबई उच्च न्यायलय में पहुंचा तो न्यायलय ने निचली अदालत के फैसले को ख़ारिज करते हुए कहा की थाना परिसर में पुलिस कांस्टेबल के दवारा डरा कर किया गया  सेक्स, सहमति के साथ बनाया गया सम्बन्ध नही माना जाता। लेकिन 1979 में माननिये सर्वोच्च न्यायलय ने फिर से निचली अदालत के फैसले को बहाल करते हुए अभियुक्तो को दोषमुक्त कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद देशव्यापी आंदोलन हुआ और परिणामसवरूप 1983  में भारतीय दंड संहिता  में बलात्कार की धारा 376  में चार उपधाराएँ  ए,बी, सी, एवं डी जोड़कर हिरासत में बलात्कार (कस्टोडिअल रेप ) के लिए सजा का प्रावधान किया गया।

अरुणा शानबाग रेप केस 1973

क्रूरतम बलात्कार की शिकार हुए अरुणा अभी कुछ दिनों पहले इस दुनिया से चल बसी।  अरुणा मुंबई के एक अस्पताल में नर्स थी और वो उसी अस्पताल के एक सफाई कर्मचारी के अप्राकृतिक  सेक्स (सोडोमी) का शिकार हुई । उस समय सोडोमी को अपराध की श्रेणी में नही रखा जाता था इसलिए आरोपी पर रेप का केस ही दर्ज नही हुआ और हत्या के प्रयास और लूट पाट के मामले में उसे मात्र 7  साल की सजा सुनाई गयी। आरोपी तो 7 साल बाद आज़ाद हो गया लेकिन अरुणा 42 साल तक कोमा में जिंदिगी और मौत के बीच जूझती रही।

प्रियदर्शनी मट्टू रेप केस 1996

कानून की पढाई करने वाली प्रियदर्शनी को उसी के घर में उसके सीनियर ने रेप कर बेरहमी से मार डाला। पॉस्टमॉर्टोम की रिपोर्ट के मुताबिक उसके शरीर में 206 में से कोई भी हड्डी ऐसी नही थी जो टूटी न हो। इस केस में स्थानीय अदालत ने आरोपी संतोष कुमार को बरी कर दिया था लेकिन मीडिया के दवाब के चलते दिल्ली उच्च न्यायलय ने स्थानीय अदालत के फैसले पर रोक लगते हुए फांसी की सजा सुनाई। 2010  में सर्वोच्च न्यायलय ने सजा को कम करते हुए उसे मृत्युदंड को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया।

स्कारलेट किलिंग रेप केस

2009  में एक 15  साल की विदेशी पर्यटक स्कारलेट का गोवा बीच इलाके में बलात्कार के बाद समुद्र में डूबा कर मार दिया गया।  पीड़िता के विदेशी होने के कारण अभी तक अभी तक बलात्कारी को पकड़ा ही नही गया ।

मुंबई गैंग रेप केस

इस मामले में एक 22 वर्षीय महिला पत्रकार के साथ 5 युवको ने बलात्कार किया। फिलहाल सभी आरोपी जेल में है लेकिन कोर्ट का फैसला आना अभी बाकि है।

दिल्ली गैंग रपे केस

16  दिसंबर 2012  के दिल्ली गैंग रेप केस को अब तक का सबसे ज्यादा क्रूरतम और भयावह केस माना जाता है। इस केस में चलती बस में 6  लोगो ने लड़की के साथ रेप किया और फिर उसे सड़क पर फेंक दिया गया। लड़की (दामिनी) ने सिंगापुर की एक अस्पताल में इलाज़ के दौरान दम तोड़ दिया।

दामिनी की दुर्दशा  देखकर सवयं डॉक्टर ने कहा था की मैंने अपने पुरे करियर में में ऐसा रेप केस नही देखा।  इस केस में मुख्य अपराधी ने तो जेल में ही आत्महत्या कर ली और एक आरोपी जिसने सबसे ज्यादा दरिंदगी दिखाई उसे 18  वर्ष से कम आयु का होने के कारण 3 साल के लिए सुधर ग्रह भेजा गया तथा अन्य चार आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई गयी। फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट ने उनकी फांसी पर रोक लगा दी है।

दिल्ली रेप घटना के बाद  दिल्ली समेत पुरे देश में आक्रोश की लहर उमड़ी और जगह जगह प्रदर्शन कर दामिनी के लिए न्याय की मांग की गई।  हज़ारो की संख्या  में प्रदशणकारियों ने दिल्ली के इंडिया गेट पर पर्द्शन किया तो पुलिस ने उन पर लाठिया बरसाई लेकिन इस बार लोगो का गुस्सा पानी का बुलबुला नही था, उन्हें इस बात का जवाब चाहिए था की आखिर कब तक यूँही तार तार होती  रहेगी मर्यादायें।

घटना के 6 दिन बाद सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश जे एस वर्मा के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने एक कमिटी बनाई, इस कमिटी को 80 हज़ार सुझाव मिले  और उन सुझावों के आधार पर कमिटी ने 29 दिन बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को भेजी , कमिटी की सिफारिशों के आधार पर क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट (एंटी रेप लॉ ) 2013  बना।

एंटी रेप लॉ

नए कानून में महिलाओं के प्रति होने वाले उन अपराधों को शामिल किया गया है जिनका वो अक्सर शिकार होती हैं। यह कानून बलात्कार की परिभाषा के दायरे को भी व्यापक बनाता है। इसमें साफ तौर पर यह कहा गया है कि बलात्कार का विरोध करने में अगर शारीरिक संघर्ष के निशान न भी हों तब भी इसका मतलब रज़ामंदी से सेक्स करना नहीं होता। 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ उसकी मर्जी या मर्जी के खिलाफ संबंध रेप माना जाएगा। आईपीसी की धारा-375 के तहत रेप के दायरे में जबरन शारीरिक संबंध बनाना या अप्राकृतिक संबंध बनाना, ओरल सेक्स आदि को रखा गया है। साथ ही, प्राइवेट पार्ट के पेनेट्रेशन के अलावा किसी अन्य चीज के पेनेट्रेशन को भी इस दायरे में रखा गया है।

बलात्कार के वैसे मामले जिसमें पीडि़ता कोमा में चली जाए या जख्मी होने के कारण उसकी मौत हो जाए, इसके लिए आईपीसी की धारा 376-ए का प्रावधान किया गया है जिसमें कम से कम 20 साल और ज्यादा से ज्यादा जीवन भर के लिए उम्रकैद या फिर फांसी की सजा का प्रावधान किया गया है। गैंग रेप के लिए आईपीसी की धारा 376-डी का प्रावधान किया गया है इसके तहत कम से कम 20 साल और ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा का प्रावधान किया गया है। अगर इस दौरान पीडि़त कोमा में चली जाए या उसकी मौत हो जाए तो अधिकतम फांसी की सजा लागू होगी। सीरियल रेपिस्ट के लिए आईपीसी की धारा 376-ई का प्रावधान किया गया है, इसके तहत उम्रकैद जिसमें जीवन भर के लिए कैद या फिर फांसी की सजा का प्रावधान किया गया है।

पहले छेड़छाड़ के लिए आईपीसी की धारा-354 के तहत केस दर्ज होता था और यह जमानती अपराध था, लेकिन अब आईपीसी में छेड़छाड़ के अपराध में सजा के दायरे को बढ़ा दिया गया है और आईपीसी की धारा-354 में कई सब-सेक्शन बनाए गए हैं। इनमें कई प्रावधान गैरजमानती कर दिए गए हैं गलत तरीके से महिला को टच करने के मामले में आईपीसी की धारा-354 का प्रावधान है, इसमें 3 साल तक कैद की सजा हो सकती है। अगर किसी महिला के खिलाफ बल प्रयोग कर उसे निर्वस्त्र किया जाता है तो आईपीसी की धारा 354-बी के तहत 3 साल से 7 साल तक कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। आईपीसी की धारा 354-सी के तहत वोयरिज्म (अश्लील हरकत देखकर आनंदित) के मामले में पीडि़ता की शिकायत पर एक साल से लेकर 3 साल तक कैद की सजा का प्रावधान कर दिया गया है।

स्टॉकिंग यानी जानबूझकर किसी का पीछा करना, ऐसा कर उसकी मानसिक शांति में खलल डालना (इसके लिए फोन, ईमेल, इलेक्ट्रॉनिक या अन्य कोई भी माध्यम हो) के मामले में धारा 354-डी के तहत एक साल से लेकर 3 साल तक कैद की सजा का प्रावधान किया गया है।-एसिड अटैक यानी धारा-326 में गंभीर तौर पर जख्मी करने का प्रावधान था। उसी में नया प्रावधान धारा 326-ए जोड़ा गया। ऐसे मामले में कम से कम 10 साल और ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया गया।- ह्यूमन ट्रैफिकिंग यानी मानव तस्करी के मामले में अधिकतम उम्रकैद की सजा का प्रावधान किया गया है।

कानून में न्यूनतम सात साल की सजा का प्रावधान किया गया है जो प्राकृतिक जीवन काल तक के लिए बढ़ाया जा सकती है और यदि दोषी व्यक्ति पुलिस अधिकारी है, लोक सेवक, सशस्त्र बलों या प्रबंधन या अस्पताल का कर्मचारी है तो उसे जुर्माने का भी सामना करना होगा। कानून में भारतीय साक्ष्य अधिनियम में संशोधन किया गया है जिसके तहत बलात्कार पीड़िता को, यदि वह अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम हो जाती है तो उसे अपना बयान दुभाषिये या विशेष एजुकेटर की मदद से न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराने की भी अनुमति दी गयी है। इसमें कार्यवाही की वीडियोग्राफी करने का भी प्रावधान किया गया है।

एक और तो सर्वोच्च न्यायलय कहता है की बलात्कार से पीड़ित महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नज़रो से गिर जाती है और जीवन भर उसे इस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है, जो की उसने नही किया और दूसरी तरफ तथाकथित माइनर जिसने सबसे ज्यादा दरिंदगी की, को 3 साल के लिए सुधार ग्रह भेज दिया। इस निर्णय का जम कर विरोध हुआ और कई महिला संगठनो ने आवाज उठाई की सजा उम्र को देखकर नही बल्कि कृत्य को देख कर दी जनि चाहिए। जो बालक इस उम्र में इतना हिंसक हो सकता है उसके भविष्य की तो कल्पना भर से रूह कांप जाती है। उसे सुधार ग्रह में ऐसा कोनसा चरित्र परिवर्तन का पाठ पढ़ाया जायेगा जिससे की वो मात्र तीन साल में एक सुसंस्कृत नागरिक बनकर बाहर आएगा कोई नही जानता। इसके आलावा जिन चार आरोपियों को फांसी सुनाई गयी थी उनकी फांसी पर भी सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी जिससे पीड़िता के परिवारवालों के लिए न्याय का इंतज़ार और लम्बा हो गया है।

 

 

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