अधिकारों की जंग या स्वार्थ की जिद्द: बी सी सी आई बनाम लोढा समिति

विष्णु टांडी, संस्थापक- लेक्सखोज

bcci_57a5aabe1009c

बुनयादी समझ की बात है की कानून हमेशा अव्यवस्था को समाप्त कर व्यवस्थित ढंग से किसी प्रणाली को संचालित करने के लिए बनाया जाता है लेकिन धन और धनाढ्य वर्ग की मानसिकता अपने आप में विचित्र होती है जो कानून को काफी हद तक अपने हाथ का खिलौना या कठपुतली समझने की गलती कर बैठते है। यह भी सत्य है की जब उन पर कानून का हथौड़ा चलता है और कानून के लंबे हाथ उनकी गर्दन तक पहुंचते है तो उनके पास छटपटाने के अलावा अन्य कोई चारा नही बचता। यही स्थिति फिलाल बी सी सी आई प्रबंधन से जुड़े आकाओ की बनी हुई है।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बी सी सी आई) का गठन आजादी से पूर्व सन 1928  में हुआ था और वर्तमान में यह विश्व के सबसे अमीर क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में से एक है। इसमे कोई दो-राय नही की बी सी सी आई ने न केवल अंतरास्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व किया है बल्कि भारतीय क्रिकेट को विश्वव्यापी पहचान दिलाने में अहम् भूमिका निभाई है।

 क्रिकेट अन्य खेलों की तरह महज एक खेल ही है लेकिन जिस तरह से इसमे पैसे और रुतबे का बोलबाला उसने ऐसे भ्रस्टाचार और उठा-पटक का एक ऐसा मंच बना दिया है जिससे कोई अलग नही होना चाहता। 2009 तक बी सी सी आई की छवि साफ़ सुथरी थी लेकिन पिछले कुछ वर्षो से बी सी सी आई एवं राज्य क्रिकेट संघो पर कई कारणों से उंगलिया उठने लगी थी। ऐसी बीच 2013  में हुए आई.पी.एल. जैसी कमर्शियल इवेंट्स में सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग के खुलासे के बाद काफी खलबली मच गयी थी। बी सी सी आई के प्रबंधन में राजनीतिज्ञों व अफसरशाहों के काबिज होते जाने से यह अनेक विवादों का सीकर हो गया। प्रबंधन से जुड़े पदाधिकारियो एवं खेल मठाधीशों ने खिलाड़ियों की अपेक्षा अपने ही निजी स्वार्थो के हिसाब से बोर्ड के कानून कायदे तय करने लगे। लेकिन जब पानी सर के ऊपर से निकलने लगा तो भारत के सर्वोच्च न्यायलय को स्थिति में दखल देना पड़ा और क्रिकेट में व्याप्त भ्रस्टाचार समाप्त करने तथा बोर्ड की पारदर्शिता बनाये रखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिव्रत मुख्य न्यायाधीश आर.एम.लोढा की अध्यक्षतां वाली तीन सदस्यो की समिति बनाई।

लोढा समिति ने 4 जनवरी 2016 को 159 पन्नो की अहम् रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दी जिसमे समिति ने बीसीसीआई में बदलाव के लिए कुछ अहम सुझाव दिए हैं।

यह थी समिति की अहम् सिफारिशें
-खिलाड़ियों का एक संघ और संविधान बनाया जाए
-बीसीसीआई में एक व्यक्ति, एक पद का नियम लागू हो
-क्रिकेट को क्रिकेटर ही चलाएं और बीसीसीआई की स्वायतत्ता बनी रहे
-आईपीएल और बीसीसीआई के लिए अलग-अलग गवर्निंग काउंसिल हों
-बीसीसीआई को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के दायरे में लाया जाए
-एक राज्य में सिर्फ़ एक ही क्रिकेट संघ हो और सभी को वोट देने का हक़ हो
-सट्टेबाजी को वैध बना दिया जाना चाहिए जिसके लिए भीतर से ही कोई व्यवस्था हो
-कोई भी व्यक्ति 70 साल की उम्र के बाद बीसीसीआई या राज्य संघ पदाधिकारी नहीं बन सकता
-बीसीसीआई के किसी भी पदाधिकारी को लगातार दो से ज़्यादा कार्यकाल नहीं दिए जाने चाहिए
-समिति ने बीसीसीआई पदाधिकारियों के चयन के लिए मानकों का भी सुझाव दिया है। उनका कहना है कि उन्हें मंत्री या सरकारी अधिकारी नहीं होना चाहिए, और वे नौ साल अथवा तीन कार्यकाल तक बीसीसीआई के किसी भी पद पर न रहे हों

बीसीसीआई ने समिति की सिफारिशों पर आपत्ति जताते हुए सर्वोच्च न्यायलय में याचिका दायर की लेकिन न्यायलय ने समिति की अधिंकाश सिफारशों पर सहमति जताते हुए बीसीसीआई को उन सिफारिशों को लागु करने का आदेश दे दिया और कहाकी समिति की सिफारशें न्यायसंगत एवं व्यवहारिक है।

न्यायलय के आदेश के बाद  बीसीसीआई के सामने एक विकट समस्या यह थी की अगर सिफारिशों पर अमल नही किया तो उसकी नियत संदेह के घेरे में आ जाएगी और अगर अमल किया जाता है तो इससे जुड़े दिग्गजो का पत्ता कट जायेगा और पद की बदौलत मिली ताकत व हैसियत ख़त्म हो जाएगी।

बीसीसीआई अब देश की सबसे बड़ी अदालत से टकराव के मूड में है और यह उसी दिन जाहिर हो गया था जब उसने सर्वोच्च न्यायलय के पूर्व न्यायधीश मार्केडेय काटजू को अपना सलाहकार नियुक्त किया था। श्रीमान काटजू का तर्क है कि बीसीसीआई संविधान तमिलनाडु सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत तैयार किया गया है और सुप्रीम कोर्ट तथा लोढा समिति बीसीसीआई के उप नियमों में बदलाव के लिए बाध्य नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और लोढा समित दोनों ने तमिलनाडु सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट का उल्लंघन किया है। उनके अपने मेमोरेंडम और उप नियम हैं।  सर्वोच्च न्ययालय ने तीक्ष्ण तेवर अपनाते हुए कहा की अगर बीसीसीआई खुद को कानून से ऊपर समझती है तो वो गलत है साथ ही ये चेतावनी भी दी कि आप सुधर जाएं औऱ सिफारिशों को लागू करें, वरना कोर्ट अपनी सिफारिशों को लागू करवाने के दूसरे तरीकों पर विचार करेगा ।

बीसीसीआई अपने उसी तर्क पर कायम है की वह एक स्वायत संस्था है और लोढा समिति की सिफारिशों को लागु करने के लिए बाध्य नही है लेकिन शायद वो इस बात को भूल रहे है है की वह भारत का नाम इस्तेमाल करती है और वह जो टीम चुनती है उसे भारतीय टीम कहा जाता है इसलिए वह सार्वजनिक जवाबदारी के घेरे मे आती है और भारतीय कानून का प्रत्येक हिस्सा उस पर यथावत लागु होता है।

कोर्ट बीसीसीआई के रवैये को लेकर काफी सख्त नजर आ रहा है और इसने बीसीसीआई द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को भी ख़ारिज करते हुए बोर्ड को सारी सिफारिशें लागु करने को कहा है। अगर समिति की सारी सिफारशों पर अमल किया जाता है तो क्रिकेट का स्तर और ऊँचा होगा तथा ऐसी अनेक प्रतिभाओं को पनपने का मौका मिलेगा जो अक्सर निरंकुश अधिकारियों की मनमानी के चलते कुचल दी जाती है।

गेंद अब फिर सुप्रीम कोर्ट के पाले में है और देखना यह है की स्वार्थ की जिद्द पर अड़े खेल मठाधीश अपनी मर्जी लादने में सफल होते है या फिर सर्वोच्च न्यायलय इन्हे सही रास्ते पर लाने में सफल होता है फैसला जो भी होगा लेकिन एक बात तो स्पस्ट है की महज कुछ स्वार्थी लोग अपना स्वार्थ साधने के लिए क्रिकेट को दांव पर लगाने को उतारू है।

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s